वेस्ट टू वेल्थ: बिहार के लिए गेम-चेंजर प्रोजेक्ट, बस सरकारी प्रोत्साहन और CSR की दरकार
Muzaffarpur/Bihar: देश में सबसे अधिक गरीबी बिहार में है। बिहार से पूरे देश में रोजगार के लिए सबसे अधिक पलायन होता है। अगर इसे रोकना है तो गरीब लोगों को रोजगार और कमाई के विकल्प देने होंगे। सुमित्रा जन कल्याण सेवा संस्थान (SJKSS) सरकार और कंपनियों से अपील करता है कि ड़े से कमाई: बिहार की महिलाओं के लिए ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल प्रोजेक्ट में हमारा साथ दें और हजारों गरीबों की जिंदगी बदलें।
सुमित्रा जन कल्याण सेवा संस्थान (SJKSS) ने स्किल डेवलपमेंट का एक ऐसा मॉडल तैयार किया गया है, जहां मंदिर के ‘बासी फूलों’ और ‘गाय के गोबर’ को शुद्ध हर्बल अगरबत्ती और ऑर्गेनिक उत्पादों में बदला जा रहा है। यह कहानी सिर्फ कचरा प्रबंधन की नहीं, बल्कि ‘बिहारी मिजाज’ की आत्मनिर्भरता की है।
मार्केट का गणित: कचरे में छिपा है अरबों का कारोबार
हर्बल और ऑर्गेनिक उत्पादों का बाजार अब केवल शौक नहीं, बल्कि एक वैश्विक जरूरत बन चुका है।
हर्बल अगरबत्ती मार्केट: भारत में अगरबत्ती का बाज़ार सालाना 15% की दर से बढ़ रहा है। इसमें ‘चारकोल-फ्री’ और ‘फ्लोरल वेस्ट’ से बनी अगरबत्तियों की मांग सबसे अधिक है क्योंकि ये फेफड़ों के लिए सुरक्षित हैं।
गोबर-आधारित अर्थव्यवस्था: एक शोध के अनुसार, गोबर से बने पेंट, अगरबत्ती और दीयों का बाज़ार 2030 तक ₹5,000 करोड़ को पार करने का अनुमान है।
पर्यावरण का लाभ: अकेले भारत के मंदिरों में हर साल 80 लाख टन फूल विसर्जित किए जाते हैं, जो नदियों में प्रदूषण का बड़ा कारण बनते हैं। इन्हें रीसायकल करना प्रकृति और जेब दोनों के लिए फायदेमंद है।
SJKSS का ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल
संस्थान ने मुजफ्फरपुर और आस-पास के क्षेत्रों में महिलाओं को ट्रेनिंग देकर एक ‘सस्टेनेबल आजीविका’ चक्र बनाने की योजना बना रहा है:
संग्रहण: स्थानीय मंदिरों से बासी फूलों और गौशालाओं से गोबर का एकत्रीकरण।
प्रोसेसिंग: फूलों को सुखाकर उनका पाउडर बनाना और गोबर के साथ जड़ी-बूटियों का मिश्रण तैयार करना।
उत्पादन: महिलाओं द्वारा सांचों या छोटी मशीनों के जरिए धूपबत्ती, अगरबत्ती और पंचगव्य दीयों का निर्माण।
मार्केटिंग: इन शुद्ध, रसायन मुक्त उत्पादों को ‘इको-फ्रेंडली’ ब्रांड के तौर पर बाजसर में उतारना।
कॉरपोरेट जगत से अपील: आपका CSR, किसी की स्थायी मुस्कान
कंपनियों के लिए यह प्रोजेक्ट केवल दान नहीं, बल्कि एक सस्टेनेबल सोशल इन्वेस्टमेंट (SSI) है।
वर्तमान में महिलाएं बेरोजगार हैं। अगर कंपनियां अपनी CSR निधि से ‘स्वचालित अगरबत्ती मेकिंग मशीन’ और ‘पल्वरइज़र मशीन’ प्रदान करें, तो रोजगार के नए विकल्प पैदा होंगे।
ट्रेनिंग और स्किलिंग: नए बैच की महिलाओं को उच्च-स्तरीय प्रशिक्षण देने के लिए फंड की आवश्यकता है ताकि उनके उत्पादों की फिनिशिंग अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हो सके।
अपील: हम उन कंपनियों को आमंत्रित करते हैं जो पर्यावरण (Environment), सामाजिक सशक्तिकरण (Social) और पारदर्शिता (Governance) यानी ESG लक्ष्यों में विश्वास रखती हैं। आइए, बिहार की इन महिलाओं को ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मशीनों से लैस करें और कचरे को समृद्धि में बदलें।”
बदलाव की महक
जब एक महिला अपने हाथ से बनाई हुई अगरबत्ती को बाज़ार में बेचती है, तो वह केवल एक उत्पाद नहीं बेचती, बल्कि अपना आत्मविश्वास बेचती है। बिहार की मिट्टी में वो ताक़त है कि वह ‘गोबर’ को भी ‘गोल्ड’ बना दे, बस ज़रूरत है तो आधुनिक तकनीक और कॉरपोरेट सहयोग के एक छोटे से धक्के की।